गुरुवार, 20 जुलाई 2017

साहित्य और कला माध्यमों का माफिया मीडिया तो क्या राजनीति के माफिया का बाप है। --पलाश विश्वास

सबसे बड़ा सच यही है मीडिया तो झूठन है,जिसे पेट खराब हो सकता है,लेकिन दिलों और दिमाग को बिगाड़ने में साहित्य और कला माध्यम निर्णायक है और वहां बी संघ परिवार का वर्चस्व है।संघ परिवार के लोग ही धर्निरपेक्ष प्रगतिशील भाषा और वर्तनी में आम जनता के केसरियाकरण का अभियान चलाये हुए हैं।
साहित्य और कला माध्यमों का माफिया मीडिया तो क्या राजनीति के माफिया का बाप है।

--पलाश विश्वास
समय की चुनौतियों के लिए सच का सामना अनिवार्य है।आम जनता को उनकी आस्था की वजह से मूर्ख और पिछड़ा कहने वाले विद्वतजनों को मानना होगा कि हिंदुत्व की इस सुनामी के लिए राजनीति से कहीं ज्यादा जिम्मेदार भारतीय साहित्य और विभिनिन कलामाध्यम हैं।राजनीति की जड़ें वहीं हैं।भारत में हिंदुत्व की राजनीति में गोलवलकर और सावरकर की बात तो हम करते है,लेकिन बंकिम के महिमामंडन से चूकते नहीं है।गोलवलकर,सावरकर,हिंदू महासभा और संघ परिवार से बहुत पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के पक्ष में बंकिम ने आदिवासी किसान बहुजनों के विरोध में जिस हिंदुत्व का आवाहन किया,वही रंगभेदी दिंतुत्व की राजनीति और सत्ता का आधार है।
ताराशंकर बंद्योपाध्याय जमींदारों और राजा रजवाड़ों के सामंती वर्चस्व के वर्णव्यवस्था समर्थक कांग्रेसी नर्म हिंदुत्व के साहित्य के सर्जक है।
अब यह कहना कि बंकिम और विवेकानंद संघ परिवार के न हो जायें तो हमें अपने पाले में बंकिम और विवेकानंद चाहिए और हम उन्हें धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील हिंदुत्व का आइकन बना दें या ताराशंकर जैसे साहित्यकार को हम संघ के पाले में जाने न दें।
जो जनविरोधी उपभोक्तावादी जनपद और जड़ों से कटा साहित्य है,उसका महिमामंडन करने से हालात नहीं बदलेंगे।अगर हालत बदलने हैं तो प्रतिरोध की परंपरा की पहचान जरुरी है और उसे मजबूत करना,आगे बढ़ाना अनिवार्य है।
हिंदी के महामहिम लोग अपने गिरेबां में पहले झांककर देखे कि हमने प्रेमचंद और मुक्तिबोध की परंपरा को कितना मजबूत किया है।
संघ परिवार साहित्यऔर कला माध्यमों में कहीं नहीं है और सिर्प केसरिया मीडियाआज के हालात के लिए जिम्मेदार है,कम से कम मैं यह नहीं मानता।अभी तो ताराशंकर और बंकिम की चर्चा की है,आगे मौका पड़ा तो बाकी महामहिमों के सच की चीरफाड़ और उससे कहीं ज्यादा समकालीनों के मौकापरस्त सुविधावादी  साहित्य का पोस्टमार्टम भी कर दूंगा।
उतना अपढ़ भी नहीं हूं।मेरे पास कोई मंच नहीं है।इसलिए यह न समझें कि कहीं मेरी बात नहीं पहुंचेगी।सच के पैर बहुत लंबे होते हैं।
सबसे बड़ा सच यही है मीडिया तो झूठन है,जिसे पेट खराब हो सकता है,लेकिन दिलों और दिमाग को बिगाड़ने में साहित्य और कला माध्यम निर्णायक है और वहां बी संघ परिवार का वर्चस्व है।संघ परिवार के लोग ही धर्निरपेक्ष प्रगतिशील भाषा और वर्तनी में आम जनता के केसरियाकरण का अभियान चलाये हुए हैं।
साहित्य और कला माध्यमों का माफिया मीडिया तो क्या राजनीति के माफिया का बाप है।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

No Parliamentary relief for Darjeeling Hills and Indian politics shows unprecedented apathy against the Himalayan region and its people under serious threat of greater calamity! Palash Biswas

No Parliamentary relief for Darjeeling Hills and Indian politics shows unprecedented apathy against the Himalayan region and its people under serious threat of greater calamity!
Palash Biswas

No end of violence in Darjeeling Hills.Protesters torch police vehicle, set govt buildings on fire!No Parliamentary relief for Darjeeling Hills and Indian politics shows unprecedented apathy against the Himalayan region and its people under serious threat of greater calamity!
According to police reports, century-old community hall and a TMC party office in the Darjeeling hills were set ablaze by pro-Gorkhaland supporters earlier in the day as the indefinite shutdown for a separate state entered its 35th day.
Parliament session is not going to help the common people of Darjeeling.Mamata Banerjee wrote about her concern on chicken corridor which connects Assam and Northeast with rest of India.Mamata as well as Mahbooba Mufti have spoken a lot about Chinese hand in Kashmir and Darjeeling hills.
Meanwhile,Netaji Mulayam Singh Yadav declared rather quite unexpectedly that China is the enemy of India,not Pakistan.
Sikkim stand off is still heralding greater challeng to India`s security,unity and integrity while the entire Himalayan range has become quite volatile.It is reported in media that Bhutan has demanded via diplomatic channels that India and China ,both should remove ther armies frmom Dokalm.It is not official however.But it seems taht bilateral border issue between China and Bhutan has ironically become the bone of contention to create major calamity in the Himalayan region accross the border.
On the other hand ,Darjeeling burns have no impact in power circles in New Delhi as well as Kolkata even if human rights are killed,the game should contnue.
ABP Anand reports:
দার্জিলিং: অশান্তির বিরাম নেই পাহাড়ে। লেগেই আছে ভাঙচুর, আগুন। ফের পুড়িয়ে দেওয়া হল পুলিশের গাড়ি। হামলা চলল কার্শিয়ঙের শতাব্দী প্রাচীন কমিউনিটি হলে। প্রতিটি ক্ষেত্রেই মোর্চার বিরুদ্ধে অভিযোগ উঠলেও, তা অস্বীকার করেছে মোর্চা। ২১ জুলাই পাহাড়ে ধিক্কার দিবসের ডাক নারী মোর্চার।
একদিকে, বনধে অনড় মোর্চা। অন্যদিকে, পাহাড় জুড়ে অশান্তির আগুন। সব মিলিয়ে বিপর্যস্ত পাহাড়বাসীর জনজীবন। মঙ্গলবারের ধুন্ধুমারের পর পরিস্থিতি বদলাল না বুধবারও। মঙ্গলবার গভীর রাতে দার্জিলিংয়ের জজবাজারে তৃণমূলের পার্টি অফিস ভাঙচুরের পর আগুন লাগিয়ে দেওয়া হয়। আর বুধবার সকালে, ওই জায়গায় পোড়ানো হয় পুলিশের গাড়ি।
অশান্তি চলেছে পাহাড়ের অন্য অংশেও। মঙ্গলবার গভীর রাতে কার্শিয়ঙের শতাব্দীপ্রাচীন, রাজ রাজেশ্বরী কমিউনিটি হলে আগুন লাগিয়ে দেওয়া হয়। দমকলের ২টি ইঞ্জিন ঘটনাস্থলে পৌঁছনোর আগেই পুড়ে ছাই হয়ে যায় গোটা কমিউনিটি হলটি।
ওই একই সময় কার্শিয়ঙেই, রাজ্য সরকারের একটি ট্যুরিস্ট লজের রান্নাঘরে আগুন লাগানো হয়। শুধু তাই নয়, রাতের অন্ধকারে দুষ্কৃতীরা আগুন লাগায়, কালিম্পঙের আলগারার কাগ এলাকার পঞ্চায়েত অফিসে!
এদিন সকালে পোখরিয়াবঙ্গে পুলিশের সঙ্গে গোর্খাল্যান্ড আন্দোলনকারীদের সংঘর্ষ বাঁধে! প্রতিটি ক্ষেত্রেই মোর্চার বিরুদ্ধে অশান্তি পাকানোর অভিযোগ উঠলেও, তা উড়িয়ে দিয়েছে তারা। গোর্খা জনমুক্তি মোর্চার কেন্দ্রীয় কমিটির সদস্য সুষমা রাইয়ের দাবি, পাহাড়ে আগুন, অশন্তির নেপথ্যে মোর্চার হাত নেই, সরকারের ব্যাপার, কারা করছে দেখুক।
এই প্রেক্ষাপটে দলীয় সমর্থকদের মৃত্যুর প্রতিবাদে এদিন দার্জিলিঙে মিছিল করে নারী মোর্চা। চকবাজারে একটি সমাবেশ করা হয়। আগামী ২১ জুলাই, কলকাতায় যখন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় শহিদ সমাবেশ করবেন, তখন পাহাড়ে ধিক্কার দিবস পালন করবে নারী মোর্চা। সুষমা রাই বলেন, পাহাড়ে অশান্তি ৯ জন আন্দোলনকারী মারা গেছে, যার জন্য ২১ তারিখ নারী মোর্চার তরফে ধিক্কার দিবস পালন করা হবে। মৃত্যুর কারণ খুঁজতে সিবিআই চাই। মমতার শহিদ দিবস পালনের অধিকার নেই।
কী হবে পাহাড়ের ভবিষ্যত? কবেই বা শান্তি ফিরবে? এখন সেই প্রশ্নগুলিই ঘোরাফেরা করছে সাধারণ পাহাড়বাসীর মনে।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

प्रांजय को हटाने के पीछे अडानीवाला केस तो बहना है,असल वजह तेल की धार है पलाश विश्वास

प्रांजय को हटाने के पीछे अडानीवाला केस तो बहना है,असल वजह तेल की धार है
पलाश विश्वास
भड़ासी यशवंत के सौजन्नय से खबर यह है कि एक बड़ी खबर ईपीडब्ल्यू (इकनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली) से आ रही है। कुछ महीनों पहले इस मैग्जीन के संपादक बनाए गए जाने माने पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि अडानी ग्रुप केे गड़बड़ घोटाले से जुड़ी एक बड़ी खबर छापे जाने और इस खबर पर अडानी ग्रुप द्वारा नोटिस भेजे जाने को लेकर परंजॉय के साथ EPW के प्रबंधन का मतभेद चल रहा था।

समझा जाता है कि प्रबंधन के दबाव में न झुकते हुए परंजॉय गुहा ठाकुरता ने संपादक पद से त्यागपत्र दे दिया। इस घटनाक्रम को कारपोरेट घराने और केंद्र सरकार द्वारा मिलकर EPW प्रबंधन पर बनाए गए दबाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सच कहने सच लिखने वाले पत्रकारों पर हाल के वर्षों में प्रबंधन का काफी दबाव पड़ता रहा है जिसके फलस्वरूप ऐसे पत्रकारों को इस्तीफा देने को बाध्य होना पड़ा है।

यशवंत ने हाल में घोषणा की है कि भड़ास बंद करने जा रहे हैं।इस खबर के खुलासे से जाहिर है कि वे अपनी आदत से बाज नहीं आयेंगे और मालिकान का सरदर्द बने रहेंगे।प्रांजय को हटाये जाने का अफसोस है।प्रभाष जोशी जब किनारे कर दिये गये और प्रतिबद्ध पत्रकारों का गला जिसतरह काटे जाने का सिलसिला चला है,इसमें नया कुछ नहीं है।बहरहाल यशवंत के जरुरी भड़ासीपन के जारी रहने की उम्मीज जगने से मुझे खुशी है।

 नब्वे दशक की शुरुआत में भी पत्र पत्रिकाओं में संपाद सर्वसर्वा हुआ करते थे।आर्थिक सुधारों में शायद सबसे बड़ा सुधार यही है कि संपादक अब विलुप्त प्रजाति है।बिना रीढ़ की संपादकी निभाने वाले बाजीगरों की बात अलग है,लेकिन प्रबंधन का हिस्सा बनने के सिवाय अभिव्यक्ति की कोई आजादी संपादक को भी नहीं है।

1970 में आठवीं में ही तराई टाइम्स से लिखने की शुरुआत करने के बाद आज 2017 में भी हम जैसे बूढ़े रिटायर पत्रकार की कोई पहचान,इज्जत ,औकात नहीं है क्योंकि संपादकीय स्वतंत्रता खत्म हो जाने के बाद पत्रकारिता की साख ही सिरे से खत्म है।

ईपीडब्लू के गौरवशाली इतिहास और भारतीय पत्रकारिता में उसकी अहम भूमिका के मद्देनजर उसके संपादक के ऐसे हश्र के बाद मिशन के लिए पत्रकारिता करने का इरादा रखने वाले लोग दोबारा सोचें।पत्रकार के अलावा कुछ भी बनें तो कूकूरगति से मुक्ति मिलेगी।

प्रांजय हिंदी में ईपीडब्लू निकालने की तैयारी कर रहे थे।इस सिलसिले में उनसे संवाद भी हुआ है।उनकी पुस्तक गैस वार अत्यंत महत्वपूर्ण शोध है और भारत के राष्ट्रीय संसाधनों की खुली लूट की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए यह पुस्तक जरुरी है।

मैंने थोड़ा बहुत कांटेंटशेयर करने की कोशिश की थी,जिसके तुरंत बाद वह सारा का सारा रोक दिया गया।इस पुस्तक का सर्कुलेशन भी रोक दिया गया है।

जाहिर है कि मामला सिर्फ अडानी का केस नहीं है,इसमें तेल की धार का भी कुछ असर हो नहो,जरुर है।यही तेल की धार देश की निरंकुस सत्ता है।

मुश्किल यह है कि प्रबुद्ध जनों को सच का सामना करने से डर लगता है और वे अपने सुविधाजनक राजनीतिक समीकरण के मुताबिक सच को देखते समझते और समझाते हुए झूठ के ही कारोबार में लगे हैं।
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सोमवार, 17 जुलाई 2017

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता। संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करनेवाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों,यह जरुरी नहीं।आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं।ये लोग ही स

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता।

संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करनेवाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों,यह जरुरी नहीं।आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं।ये लोग ही संघ परिवार के केसरिया अश्वमेध के गुप्त, घातक सिपाहसालार हैं। जो राजनेताओं से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये ब्रेनवाशिंग रंगरेज हैं।


पलाश विश्वास

संदर्भः


  


Anil Janvijay

July 17 at 3:26am





तारा बाबू का कुछ पढ़ा हो किसी ने तब तो कुछ कहेंगे। पलाश विश्वास ने बिना पढ़े ही सबको संघी घोषित कर दिया, इसीलिए मैंने इनके इस लेख पर कोई जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। इन्होंने गुरुदत्त को भी नहीं पढ़ा है। बस, नाम लिख दिया है

कर्मेंदु शिशिर बंकिम चंद्र के आनंदमठ का हिंदुत्व से कुछ लेना देना नहीं मानते और वे ताराशंकर को क्सालिक मानते हैं और उनके सामंती मूल्यों पर चर्चा से उन्हें आपत्ति हैं।कर्मेंदु एक जमाने में हिंदी के सशक्त प्रतिबद्ध कथाकार माने जाते रहे हैं।इधर के उनके मंतव्यों को देख लें तो समझ में आ जायेगा कि कैसे हमारे तमाम प्रिय लोगों का पक्ष प्रतिपक्ष बदल गया है।मानुषी का स्त्रीपक्ष भी बदल गया है।हम साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में इस कायाकल्प की बात कर रहे थे।

मीडिया के केसरियाकरण पर आम सहमति के बावजूद साहित्य और संस्कृति के केशरिया आधार,गढ़ों,किलों और मठों पर कोई विमर्श क्यों नहीं है,मेरा मुद्दा दरअसल यही है।अपवादों की हम चर्चा नहीं कर रहे,राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता की बात बी हम नहीं कर रहे।समता,न्याय और सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर जनपक्षधर साहित्य की बात हम कर रहे हैं।हमारे लिए शाखा या संघ संस्थानों से जुड़ाव भी कोई कसौटी नहीं है।मनुस्मृति बहाली के सवाल पर साहित्य में संघ परिवार के एजंडा के मुताबिक साहित्य सांस्कृतिक अखिल भारतीय परिदृश्य के अलावा हम इस उपमाद्वीप के जिओ सोशियो इकानामिक पोलिटिक्स के नजरिये से हमेशा अपनी बात रखते आये हैं।

असहमति हो सकती है।आप हमारे तर्कों को सिरे से खारिज कर सकते हैं।इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हम सम्मान करते हैं।हिंदुत्ववादियों के गाली गलौज का भी हम खास बुरा नहीं मानते।जगदीश्वर जी शायद मुझे कोलकाता में होने की वजह से थोड़ा बहुत जानते हैं,जिनके फेसबुक मतव्य पर हमने मंतव्य किया है औय यह मंतव्य कोई शोध पत्र नहीं है कि संदर्भ प्रसंग सहित प्रमाण फेसबुक पर पेश किया जाये।

जनविजय जी ने कह दिया कि मैंने तारा बाबू या गुरुदत्त को पढ़ा ही नहीं है।यानी उनके मुताबिक मैं अपढ़ और लापरहवा दोनों हूं।हम पलटकर यह नहीं कहेंगे कि उ्नहोंने ताराशंकर को पढ़ा नहीं है।विद्वतजन हम जैसे लोगों को अपढ़,अछूत और अयोग्य मानते हैं।जीवन में इसका नतीजा हमें हमेशा भुगतना पढ़ा है।मेरे लिखे का हिंदी जगत या बंग्ला या इंग्लिश इलिट भद्रलोक समुदाय ने कोई नोटिस नहीं लिया है और मुझे अफसोस नहीं है।

चूंकि यह बहस पब्लिक डोमैन पर हो रही है तो मुझे जनविजय जी के इस मंतव्य पर थोड़ा स्पष्टीकरण देना है।कर्मेंदु शिशिर ने यह नहीं लिखा है कि मैंने ताराबाबू को नहीं पढ़ा है,तो इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है।जगदीश्वर जी असहमत हैं।

जनविजयजी जिस तरह हिंदी वालों का जन्मदिन याद रखते हैं,इससे लगता है कि वे हिंदी वालों को बहुत खूब जानते हैं।मैं चूंक नोटिस लेने लायक नहीं हूं ,वे मुझे नहीं जानते होंगे और जाहिर है कि मुझे कभी पढ़ा भी नहीं होगा।क्योंकि प्रिंट में मुझे कोई छापता भी नहीं है और न मैं पुस्तकें छपवाने में यकीन रखता हूं,तो यह उनका दोष भी नहीं है।

मैंने थोड़ बहुत पढ़ाई बचपन से लेकर अब तक की है।जनविजय जी को मालूम होना चाहिए कि बंगाली परिवारों में सत्तर के दशक तक रवींद्र नजरुल माइकेल विद्यासागर शरत ताराशंकर का पाठ अनिवार्य दिनचर्या रही है।सत्तर के दशक तक हमने भक्तिभाव से वह सारा साहित्यआत्मसात किया है बंगाली संस्कृति के मुताबिक।यह मेरा कृत्तित्व नहीं है।सामुदायिक,सामाजिक जीवन का अभ्यास है।बाकी सत्तर के दशक में जीवन दृष्टि सिरे से बदल जाने से वह भक्तिभाव नहीं है जो रामचरित मानस,गीता भागवत, पुराण,उपनिषद पाठ का होता है।

यही मेरा अपराध है।

जनविजय जी,क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता।मुक्तिबोध ने कहा है कि सरल होने का मतलब जनता का साहित्य नहीं होता।कबीर दास की रचनाओं को हम सरल नहीं कह सकते क्योंकि उसका दर्शन बेहद जटिल है।लेकिन उनका पक्ष जनता का पक्ष है,यह कहने में दिक्कत नहीं है।रामचरित रचने वाले गोस्वामी तुलसी दास का रामायण क्लासिक लोकसाहित्य है लेकिन उनका मर्यादा पुरुषोत्तम हिंदू राष्ट्र का अधिनायक और मनुस्मृति अनुसासन लागू करने वाला है।उनका राम स्त्री विरोधी है।इस सच का सामना करने का मतलब यह कतई नही है कि हम संतों के सामंत विरोधी आंदोलन को खारिज कर रहे हैं।

बहुत कुछ महत्वपूर्ण और क्लासिक लिखा जा रहा है।हमारे समय के दौरान उदय प्रकाश और संजीव ने बहुत कुछ रचा है।संजीव के रचनास्रोतों और उनकी पृष्ठभूमि से मैं परिचित हूं और उदयप्रकाश की रचनाओं की खूब सराहना होने के बावजूद मैंने उसे जनपक्षधर नहीं बताया है।इसी के साथ संजीव को बी मैंने बदलाव का साहित्यकार नहीं माना है।

बांग्ला में अस्सी के दशक के बाद जो कोलकाता केंद्रित साहित्य लिखा जा रहा है,उसके मुकबले हमने हमेशा बांग्लादेश के जनपद केंद्रित या असम,त्रिपुरा,बिहार में लिखे जा रहे बांग्ला साहित्य को बेहतर माना है।इसलिए सुनील गंगोपाध्याय समूह के लेखकों और कवियों के पक्ष में मैं कभी नहीं रहा हूं।

बांग्ला में माणिक बंद्योपाध्याय,महाश्वेता या नवारुण दा को भद्रलोक समाज क्लासिक नहीं मानता और वह ताराशंकर के बाद सीधे सुनील संप्रदाय का महिमामंन करता है जैसे आज भी धर्मवीर भारती अज्ञेय के वंशज हिंदी में मठों के मालिकान हैं।

सत्तर के दशक में हिंदी, बांग्ला,मराठी,पंजाबी साहित्य का जो जनप्रतिबद्ध कृषि क्रांति समर्थक धारा है,वह मुक्तबाजार में किसतरह कारपोरेटमीडिया की तर्ज पर कारपोरेट हिंदुत्व के मूल्यों के अबाध पूंजी प्रवाह में तब्दील है,मेरी मुख्य चिंता इस सांस्कृतिक सामाजिक कायाक्लप की है,जिसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति निरंकुश रंगभेदी मनुस्मृति सत्ता है और जिसका धारक वाहक संघ परिवार है।

जरुरी नहीं है कि साहित्य और संस्कृति की यह धारा सीधे तौर पर गुरु गोलवलर और सावरकर विचारधारा से प्रेरित है।सरकारी खरीद,सरकारी अनुदान और पाठ्यक्रम के मुताबिक प्रकाशन तंत्र की वजह से हिंदी में राजबाषा होने की वजह से भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा पूंजी खपने की वजह से एक अदृश्य सर्वशक्तिमान सवर्ण जातिवादी माफिया तंत्र हैं,जिसमें प्रकाशक,आलोचक और संपादक वर्ग समाहित है।पाठ्यक्रम में किताबों की खरीद तय करने वाले प्राध्यापकों का एक शक्तिशाली तबका भी हिंदी पर कंडली मारे हुए है।लघु पत्रिका आंदोलन के अवसान के बाद इसलिए सरकारी पूंजी से हिंदी में केसरियाकरण या केसरिया कायाकल्प निःशब्द रक्तहीन क्रांति है और इस सच का सामना विद्वतजन करना  नहीं चाहते।

जगदीश्वरजी ने संघ की विचारधारा से जुड़ी रचनाधर्मिता पर सवाल उठाया है,क्लासिक साहित्य पर नहीं।लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति के मुताबिक गोस्वामी तुलसीदास बेजोड़ हैं,लेकिन उनका राम स्त्रीविरोधी,अनार्यसभ्यताविरोधी,द्रविड़ विरोध,अस्पृश्यता का समर्थक और हिंदू राष्ट्र की नस्ली विचारधारा का मूल स्रोत है,यह लिखने से आप कहेंगे कि हमने रामायण भी  है


संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करनेवाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों,यह जरुरी नहीं।आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं।ये लोग ही संघ परिवार के केसरिया अश्वमेध के गुप्त, घातक सिपाहसालार हैं। जो राजनेताओं से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये ब्रेनवाशिंग रंगरेज हैं।



जनविजय जी,आप हमें साहित्य का आदमी नहीं मानते।आपको मालूम होना चाहिए कि मैंने ताराशंकर बंद्योपाध्याय का लिखा हर उपन्यास पढ़ा है और उन पर बनी फिल्में भीि देखी हैं।मैने बहुत पहले अंग्रेजी में एक लेख तारासंकर के रचनासमग्र पर लिखा था,human documentation of hatred:

http://palashbiswaslive.blogspot.in/2008/07/human-documentation-of-hatred.html

ताराशंकर की रचनाएं बंगाल में जमींदार तबके के संकट और औद्योगीकरण की वजह से उत्पादन प्रणाली में जमींदारी और जातिव्यवस्था के टूटन के विरुद्ध है।उनके सबसे मशहूर उपन्यास गणदेवता का चंडीमंडप का चौपाल मनुस्मृति व्यवस्था को बनाये रखने की कथा है क्योंकि जाति अनुशासन तोड़कर गांव के लोग शहरो में जाकर अपना पेशा बदल रहे थे।सत्यजीत राय की फिल्म जलसाघर आपने देखी होगी,जिसमें जमींदारी के पतन का विषाद मुख्यथीम है।गौरतलब है कि बंगाल में स्वराज आंदोलन जमींदारों के पतन और स्थाई बंदोबस्त के टूटने के कारण शुरु हुआ क्योंकि तब तक बंगाल में आदिवासी किसान विद्रोहों और मतुआ आंदोलन की वजह से बहुजन आईंदोलन सवर्ण वर्चस्व को तोड़ने लगा था और तीनों अंतरिम सरकारें गैर सवर्ण दलित मुस्लिम नेतृत्व में थी।

भाषा,शिल्प के मुताबिक ताराशंकर मेरे भी प्रिय कथाकार हैं।उनकी रचनाओं में चरित्रों और परिस्थितियों का जो ब्यौरेवार विश्लेषण चित्रण है,उसका मुकाबला भारतीय साहित्य मे शायद किसी के साथ नहीं हो सकता।बंगाल में सामाजिक यथार्थ उपन्यास में उन्होने ही सबसे पहले पेश किया है।उनकी रचनाएं क्लासिक है,इसमें कोई दो राय नहीं है।

हम उनके पक्ष की बात कर रहे हैं।वे गांधीवादी थे और गांधी की तरह वर्ण व्यवस्था के कट्टर समर्थक थे।उनका मानवतावाद मनुस्मृति का मानवतावाद है जो रामकृष्ण मिशन का मानवता वाद है जो भारत सेवाश्रम से हिंदुत्व से अलग है।

कहने को दर्शन नर नारायण है और आचरण अस्पृश्यता है।

रामकृष्ण मिशन के मानवतावादी हिंदुत्व और कांग्रेस की नर्म हिंदुत्व की राजनीति एक सी है,जिसे किसी भी सूरत में गुरु गोलवलकर या सावरकर की विचारधारा से जोड़ा नहीं जा सकता।यहीं उदार दर्शनीय मानवतावाद और नर्म सनातन हिंदुत्व मनुस्मृति व्यवस्था के लिए संजीवनी है,जो बंगाल के नवजागरण और ब्रह्मसमाजे के बाद रामकृष्ण और विवेकानंद के स्रवेश्वरवाद की वजह से सहनीय हो गया है।इसलिए बंगाल में वैज्ञानिक ब्राह्मणतंत्र के एकाधिकार वर्चस्व के खिलाफ बहुजनों में किसा तरह का कोई विद्रोह आजादी के बाद नहीं हुआ है।यह उत्तरभारत और दक्षिण भाऱत के दलित उत्पीड़न की प्रतिक्रिया में हो रहे दलित आंदोलन के समूचे परिप्रेक्ष्य को बंगाल में अप्रासंगिक बना देता है क्योंकि इस उदार मानवता वाद की वजह से अस्पृश्यता और बेदभाव के अन्याय और असमता के तंत्र पर किसी की नजर जाती नहीं है।यह दलित उत्पीड़न से ज्यादा खतरनाक स्थिति है।

हम आज हिंदुत्व के पुनरूत्थान के लिए गुरु गोलवलकर और सावरकर की तुलना में कांग्रेस की वंशवादी,जमींदारी,रियासती,ब्राह्मणवादी हिंदुत्व को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं।कांग्रेस की यह विचारधारा सबसे ज्यादा बारतीय साहित्य में ताराशंकर के रचनाकर्म में अभिव्यक्त हुई है।जिसका महिमामंडन करने में हिंदी के विद्वतजन भी पीछे नहीं है।यह हिंदुत्वकरण की वैज्ञानिक पद्धति है।जिसकी ज़ड़ें बंगाल में हैं।

यह सच है कि माणिक बंद्योपाध्याय के पुतुल नाचेर इतिकथा और पद्मा नदीर मांझी में अंत्यज जीवन के ब्यौरे की तुलना में ताराशंकर के देहात,जनपद और अंत्यज जीवन के ब्यौरे ज्यादा प्रामाणिक हैं।

इसीतरह महाश्वेता देवी के उपन्यासों की आदिवासी दुनिया के मुकाबले ताराशंकर के आदिवासी ज्यादा असल लगते हैं।लेकिन माणिक और महाश्वेता दोनों सामंती और साम्राज्यवादी मूिल्यों के विरुद्ध थे और किसान आदिवासियों के संघर्ष की कथा तो ताराशंकर के उपन्यासों में है ही नहीं।

ताराशंकर के रचनासमग्र में  सबकुछ जमींदारी प्रथा की शोकगाथा है या मनुस्मृति अनुशासन टूटने का विलाप है।

इसी तरह शरत हर हाल में स्त्री अस्मिता का पक्षधर है लेकिन उनका हर नायक ब्राह्मण है और वे ब्रह्म समाज के कट्टर विरोधी भी थे।इसके विपरीत  किसानों , आदिवासियों के सामाजिक जीवन संघर्ष के साथ उनका साहित्य नहीं है।

इसी वजह से हम उन्हें रवींद्र नाथ और प्रेमचंद के साथ नहीं रखते हैं।

कवि ताराशंकर का  बेहद लोकप्रिय उपन्यास है,जिसपर फिल्म भी बनी है।कवि जाति से डोम है।कवि नायक हैं।लोकसंस्कृति कविगान की पृष्ठभूमि में लिखे इस उपन्यास की पंक्ति दर पंक्ति दर सारी कथा भद्रलोक सवर्ण दृष्टि से है और दलितों ,अछूतों की जीवनशैली के प्रति अटूट घृणा है।

इसीतरह हांसुली बांकेर उपकथा और नागिनी कन्यार काहिनी में वे आदिवासी जीवन का सघन ब्यौरे पेश करते हैं।लेकिन औद्योगीकरण,शहरीकरण और उत्पादन प्रणाली में बदलाव की वजह से आदिवासियों की मुख्यधारा से जुड़ने के वे खिलाफ हैं और उनके पक्षधर हैं।वहां टोटेम आधारित जीवनपद्धति और परंपरागत पेशा में बने रहने पर सारा जोर है।

मजा यह है कि ताराशंकर का समूचा रचना संसार राढ़ बांग्ला की लाल माटी में रचा बसा है और जनपद का इतना प्रामाणिक साहित्य भारतीय भाषाओं में दुर्लभ है,जिसे क्लासिक माना जाता है।हिंदी के लोग भी उन्हें क्लासिक मानते हैं।वे लोग अंग्रेजी के वेसेक्स क्षेत्र केंद्रित उपन्यासों को क्लासिक मानते हैं।लेकिल शैलेश मटियानी या फणीश्वरनाथ रेणु या शानी उनके लिए सिर्फ आंचलिक उपन्यासकार हैं।यह दोहरा मानदंड बी अजब गजब का है।

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर हो,यह कोई जरुरी नहीं है।

पूंजीवाद और मुक्तबाजार के पक्ष में क्लासिक साहित्य लिखा गया है।

जार्ज बर्नार्ड शा का एप्पल कार्ट तो सीधे तौर पर लोकतंत्र के खिलाफ राजतंत्र के पक्ष में लिखा गया नाटक है और वे भी क्लासिक हैं।शोलोखोव भी क्लासिक हैं और बोरिस पास्तरनाक भी क्लासिक है।हम गोर्की,दास्तावस्की या तालस्ताय की श्रेणी में शोलोखोव और पास्तरनाक को कहां रखेंगे,काफ्का या यूगो के मुकाबले कामू को कहां रखेंगे,मुद्दा यही है।

अज्ञेय की भाषा अद्भुत है,लेकिन उन्हें हम प्रेमचंद की श्रेणी में नहीं रखते या मुक्तिबोध के समकक्ष नहीं समझते।मोहन राकेश राजेंद्र यादव कमलेश्वर को क्या हम प्रेमचंद के साथ खड़ा पाते हैं,सवाल यही है।

सामाजिक यथार्थ के उपन्यासकार माणिक बंद्योपाध्याय या महाश्वेता देवी की रचनाओं के मुकाबले ताराशंकर ज्यादा पठनीय हैं,ज्यादा शास्त्रीय है,लेकिन वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति के विरुद्ध उनके आरोग्य निकेतन का विमर्श प्रतिगामी है,यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है।

साठ के दशक में हमने गुरुदत्त के तमाम उपन्यास पढ़े हैं।भारत विभाजन की कथा से

लेकर आर्यसमाज की विचारधारा पर केंद्रित उपन्यास और कम्युनिस्ट,गांधी नेहरु विरोधी उपन्यास भी।

इसी तरह नरेंद्र कोहली और आचार्य चतुरसेन को भी हमने खूब पढ़ा है।

कोहली और चतुरसेन की रचनाएं साहित्यिक दृष्टि से ज्यादा समृद्ध थीं और आम जनता पर उसका कोई खास असर नहीं रहा है।गुरुदत्त लेकिन काफी असरदार थे।

क्योंकि आर्यसमाज की हिंदुत्व के पुनरूत्थान में वही भूमिका है जो बंगाल में रामकृष्ण मिशन की है या यूपी में पतंजलि योगाभ्यास की है।

उत्तर भारत के शहरों मे संघ परिवार की शाखा प्रशाखा का विस्तार सरस्वती सिशु मंदिर के साथ साथ आर्यसमाज आंदोलन के साथ हुआ है।गुरुदत्त के तमाम उपन्यासों में गांधी नेहरु की विचारधारा और कम्युनिस्टों के उग्र विरोध के साथ भारत विभा्जन से लिए मुसलमानों और गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया है।जो साहित्य में भले ही उपेक्षित रहा हो,लेकिन हिंदी के हिंदुत्ववादी,आर्यसमाजी पाठकों में उसका असर अमिट है।शरणार्थी परिवार से होनेकी वजह से जूनियर कक्षाओं में ये उपन्यास पढ़ते हुए  हम भी कापी विचलित रहे हैं।

आपको शायद हैरत होगी कि हम पिछले चार दशकों से हिंदी,बांग्ला और दूसरी भारतीयभाषाओं के साहित्य का अध्ययन करता रहा हूं।अंग्रेजी साहित्य का विद्यार्थी होने के बावजूद मैंने रूसी,फ्रांसीसी और यूरोपीय भाषाओं का साहित्य ज्यादा पढ़ा है।


मीडिया की तरह साहित्य और संस्कृति के केसरियाकरण जो हो रहा है,अध्यापक प्राध्यापक केंद्रित साहित्य और विमर्श का जो मनुस्मृति बोध है,वह आरएसएस की विचारधारा के मुताबिक है।

मैंने बंगाल के अलावा बांग्लादेश के साहित्य पर भी लगातार अध्ययन किया है ,जो जनपद केंद्रित हैं,बोलियों में लिखा गया है।

हर किसी को आलोचकों,संपादकों और प्रकाशकों के हितों के मुताबिक या खेमाबंदी के तहत महान कह देने वाला मैं नहीं हूं।हालांकि आप सही है कि मेरे लिखे पर आप जैसे विद्वतजन कोई महत्व देना जरुरी नहीं समझते।


रविवार, 16 जुलाई 2017

उनके पास साहित्यकार नहीं हैं तो हमारे पास कितने साहित्यकार बचे हैं? शिक्षा व्यवस्था आखिर क्या है?

उनके पास साहित्यकार नहीं हैं तो हमारे पास कितने साहित्यकार बचे हैं? शिक्षा व्यवस्था आखिर क्या है?
पलाश विश्वास
हमारे आदरणीय जगदीश्वर चतुर्वेदी ने फेसबुक वाल पर सवाल किया है कि पांच ऐसे उपन्यासों के नाम बतायें,जो संघ परिवार की विचारधारा से प्रेरित है।इसकी प्रतिक्रिया में दावा यही है कि संघ परिवार के पास कोई साहित्यकार नहीं है।
लगता है कि बंकिम वंशजों को पहचानने में लोग चूक रहे हैं।गुरुदत्त का किसी आलोचक ने नोटिस नहीं लिया,लेकिन वे दर्जनों उपन्यास संघी विचारधारा के पक्ष में लिकते रहे हैं।
आचार्य चतुरसेन और नरेंद्रकोहली के मिथकीय आख्यान से लेकर उत्तर आधुनिक विमर्श का लंबा चौड़ा इतिहास है।
इलाहाबादी परिमल को लोग भूल गये।
सामंती मूल्यों के प्रबल पक्षधर ताराशंकर बंद्योपाध्याय जैसे ज्ञानपीठ,साहित्य अकादमी विजेता दर्जनों हैं।
कांग्रेस जमाने के नर्म हिंदुत्व वाले मानवतावादी साहित्यकार और संस्कृतिकर्म भी हिंदुत्व की विचारधारा को पुष्ट करते रहे हैं।
जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद आपातकाल के अवसान के बाद मीडिया के केसरियाकरण को सिरे से नजरअंदाज करने का नतीजा सामने है।
समूचा मीडिया केसरिया हो गया है।
भारतीय भाषाओं के साहित्य,माध्यमों और विधाओं, सिनेमा, संगीत,मनोरंजन,सोशल मीडिया में जो बजरंगी सुनामी जारी है,उसे नजरअंदाज करना बहुत गलता होगा।
उनके पास साहित्यकार नहीं है,यह दावा सरासर गलत है।नस्ली,सामंती,जाति वर्चस्व से मुक्त साहित्य क्या लिखा जा रहा है और ऐसा साहित्य क्या लिखा जा रहा है,जो रंगभेदी शुद्धतावादी हिंदुत्व की विचारधारा के प्रतिरोध में है,यह कहना मुश्किल है।
मानवतावादी साहित्य के नामपर सामंती मूल्यों को मजबूत करने वाले साहित्यकारों की लंबी सूची है।
बंकिम के आनंदमठ से चर्चा की शुरुआत करे तो सूची बहुत लंबी हो जायेगी।
संघ परिवार के संस्थानों,उनकी सरकारों से सम्मानित,पुरस्कृत साहित्यकारों, संपादकों,आलोचकों की पहले गिनती कर लीजिये।बहुजन विमर्श के अंबेडकरी घराने के अनेक मसीहावृंद के नाभिनाल भी संघ परिवार से जुड़े हैं।नई दिल्ली न सही, नागपुर, जयपुर, लखनऊ,गोरखपुर,भोपाल,कोलकाता,चंडीगठ से लेकर शिमला और गुवाहाटी से लेकर बेंगलूर तक तमाम रंग बिरंगे साहित्यकार संघ परिवार की संस्थाओं से नत्थी है।
हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान की तर्ज पर उग्र बंगाली,असमिया,तमिल सिख राष्ट्रवादी की तरह हिंदी जाति का विमर्श भी प्रगतिशील विमर्श का हिस्सा रहा है,जो संघ परिवार की नस्ली रंगभेदी विचारधारा के मुताबिक है।
हिंदी क्षेत्र के साहित्यकार संस्कृतिकर्मी हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान के बहुजन विरोधी विचारधारा से अपने को किस हद तक मुक्त रख पाये हैं और उनके कृतित्व में कितनी वैज्ञानिक दृष्टि,कितनी प्रतिबद्धता और कितना सामाजिक यथार्थ है,आलोचकों ने उसकी निरपेक्ष जांच कर ली है तो मुझे मालूम नहीं है।
हम नामों की चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन बुनियादी मुद्दों, समाज,जल.जंगल,जमीन,उत्पादन प्रणाली और आम जनता के खिलाफ एकाधिकार कारपोरेट हिंदुत्व के अस्श्वमेधी नरसंहार अभियान के पक्ष में यथास्थितिवाद, आध्यात्म, मिथक, उपभोक्तावादी ,बहुजन विरोधी,स्त्री विरोधी साहित्य सही मायनों में संघ परिवार की विचारधारा से ही प्रेरित है।
असमता और अन्याय की सामंती व्यवस्था के पक्ष में  मुख्यधारा का समूचा साहित्य है, मीडिया है, माध्यम और विधाएं हैं।यह सबसे बड़ा खतरा है।
आजादी से पहले और आजादी के बाद भारतीय भाषाओं हिंदुत्व की विचारधार की जो सुनामी चल रही है,वह साहित्य और संस्कृति,माध्यमों और विधाओं के गांव,देहात,जनपद,कृषि से कटकर महाजनी सभ्यता के मुक्तबाजार हिंदू राष्ट्र में समाहित होने की कथा है।
समूची शिक्षा व्यवस्था हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक है,जिसका मूल स्वर सरस्वती वंदना है।जहां विविधत और सहिष्णुता जैसी कोई बात नहीं है।साहित्य के अध्यापकों और प्राध्यापकों का केसरिया कायाकल्प तो हिंदुत्व के पुनरूत्थान से पहले ही हो गया था कांग्रेसी नर्म हिंदुत्व के जमाने में,इसलिए बजरंगी अब रक्तबीज हैं।
भारतीय भाषाओं में चूंकि आलोचकों और संपादकों की भूमिका निर्णायक है और प्रकाशकों का समर्थन भी जरुरी है,उसके समीकरण अलग हैं,इसलिए संघ समर्थक साहित्य की चीरफाड़ कायदे से नहीं हुई।
अनेक प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष आदरणीय आदतन बहुजनविरोधी,आध्यात्मवादी,सामंती मल्यों के प्रवक्ता,सवर्ण वर्चस्ववादी नायक अधिनायक के सर्जक,सामंती प्रेतों को जगानेवाले,जाति व्यवस्था,शुद्धतावाद,पितृसत्ता,नस्ली वर्चस्व के पैरोकार हैं,जिनकी व्यक्तित्व कृतित्व की हमारे जातिसमृद्ध आलोचकों ने नहीं की है।
इनमें से ज्यादातर प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष लबादे में संघ परिवार के एजंडे को ही मजबूत करते रहे हैं,कर रहे हैं।
उनके पास साहित्यकार नहीं हैं तो हमारे पास कितने साहित्यकार बचे हैं?

शनिवार, 15 जुलाई 2017

Anatomy of Basirhat (West Bengal) Violence Ram Puniyani

Anatomy of Basirhat (West Bengal) Violence

 

Ram Puniyani

 

In an insane act of violence two people lost their lives in Basirhat (West Bengal, 04 07 2017). From last quite some time the social media is abuzz that WB is turning Islamist, Hindus are under great threat, their condition is becoming like that of Pundits in Kashmir. The section of TV media projected the view that WB is not safe for Hindus but is a heaven for Muslims. Angry posts are also declaring that Mamata is appeasing Muslims, Islamist Radicals are growing in Bengal with support from the Mamata Government etc.

This act of violence was provoked by a facebook post. (July 04, 2017) Once it was known in the area as to who has done the posting, they surrounded the house where the 17 year old boylived. The posting was derogatory to Muslims. As the atmosphere was building up the state machinery kept silent, till the aggressive mob of Muslims surrounded the house. Police intervention was too late. While the boy was saved despite the angry mob which was demanding that boy handed over to them

BJP leaders got hyperactive and visited the area as a delegation. They tried to enter the hospital to see the dead body of Kartik Chandra Ghosh (Age 65). Muslim attackers had killed him. This attempt of the BJP leaders was to derive political mileage from the situation as BJP claimed that Ghosh was President of one of the units of BJP, while Ghosh's son denied it.

 The Governor of West Bengal, K.N. Tripathi, reprimanded Mamata Bannerjee for the violence. Seeing his attitude Mamata got upset and called him as the one belonging to BJP block level leader. Same Governor has been called as a 'dedicated soldier of Modi Vahini' by one BJP leader Rahul Sinha. The communal violence has taken a political color, BJP accusing chief minister Mamata Banerjee of appeasement of Muslims while the ruling Trinamool Congress is alleging that BJP is out for inciting communal passions to benefit electorally. Surprisingly with this violence, where two people have lost their life, BJP is demanding the President's rule in the state, while the law and order has already been restored within a week's time.

The picture in Bengal is very complex. A section of Muslim leadership is repeatedly doing violence in response to 'hurt sentiments'. Earlier also violence was unleashed by Muslims in Kaliachak, when one Kamlesh Tiwari had posted something offensive against Prophet Mohammad. The feeling of impunity enjoyed by this section of Muslim leadership is giving a big handle in the hands of Hindutva forces, for which this yet again is opportunity to polarize the society along religious lines. Here in Bengal they don't have to create the issue of 'Holy Cow' or 'Ram Temple', it is being provided by this misguided section of Muslim leadership.  

The picture is being created that Bengal is in the grip of Islamization as earlier Kaliachak violence and now this violence are being cited to show that Hindus are unsafe here. There was no loss of life in Kaliachak incident but yes there was loss of property, though. The core theme of BJP-RSS propaganda is built around Hindu victimization.

The role of government has been far from satisfactory in this violence, as it had time enough to control the situation but it did not. The law and order machinery must ensure prevention of the buildup of such incidents. By and large one can say that effective system can prevent most of the riots, irrespective of who is the offender. Here the Government should have acted in time.

Surely, Mamata's alleged appeasement of Muslims does not apply in economic matters. The fact is that the economic conditions of Muslims of Bengal are among the worst in the country. The budgetary allocation for minorities in Bengal is much less than in many other states.

At the same time the communal polarization by the BJP is coming up with the menacing speed. In a state where Ram Navami (Lord Ram's birth day celebration) was practically unheard of, this year around the Ram Navami procession was taken out with frightening swords in hands. Lord Ganesh festival is also being promoted in the state where Ma Durga had been the main deity so far.

Finally, who benefits from the violence? The studies of different scholars on communal violence in India like those by Paul Brass point out that there is an institutional riot mechanism, the core part of which is the impunity enjoyed by the offenders, the abysmal role of justice delivery system as a whole. Another significant study from Yale University tells us that in the places where communal violence takes place, in the long run at electoral level, it is BJP which stands to benefit. Those who appease the Muslim fundamentalists should note this and see to it that that, to discharge the constitutionally assigned duties are the essence of governance, irrespective of the community involved in the violence.

Let's summarize the anatomy of violence in Bashirghat. Stage one, the offensive post on face book, two fundamentalist radical sections of Muslims unleash violence, number three the approach of the state government fails in preventing the violence. Number four BJP carries on from there and worsens the atmosphere by playing out videos which showed that Muslims were attacking Hindus in Basirhat. It turned out that videos were not from Bashirhat at all. They were taken from Gujarat violence of 2002. Also clips of a Bhojpuri films showing the molestation of Hindu women were recklessly circulated, the impression being given that this is happening in Basirhat. The same was claimed by BJP's national general secretary Kailash Vijayvargiya, who said that he had news of Hindu women being raped in the affected area. And lastly drums are beaten about victimization of Hindus in Bengal. One just hopes it will not lead to polarization of communities leading in a state where so far communal violence had been reasonably under check.

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

खेती की तरह आईटी सेक्टर में भी खुदकशी का मौसम गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा


खेती की तरह आईटी सेक्टर में भी खुदकशी का मौसम

गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा है।

पलाश विश्वास

नोटबंदी और जीएसटी के निराधार आधार चमत्कारों के मध्य अब किसानों मजदूरों के अलावा इंजीनियरों की खुदकशी की सुर्खियां बनने लगी है।प्रधान सेवक अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान महाबलि ट्रंप से हथियारों और परमाणु चूल्हों का सौदा तो कर आये लेकिन अमेरिकी नीतियों की वजह से खतरे में फंसे आईटी क्षेत्र में लगे लाखों युवाओं के लिए एक शब्द भी खर्च नही किया।अभी पिछले  गुरुवार को पुणे की एक होटल की बिल्डिंग से कूदकर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी जान दे दी। कमरे में मिले सुसाइड नोट में मृतक इंजीनियर ने आईटी क्षेत्र में जॉब सिक्योरिटी नहीं होने की वजह से खुदकशी  कर ली।

यह आईटी सेक्टर में गहराते संकट के बादलों का सच है,जिससे भारत सरकार सिरे से इंकार कर रही है।

गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा है।

यह सिर्फ एक आत्महत्या का मामला नहीं है कि आप राहत की सांस लें कि बारह हजार खेत मजदूरों और किसानों की खुदकशी के मुकाबले एक खुदकशी  के मामले से बदलता कुछ नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से आईटी सेक्टर में छाई मंदी को लेकर इस प्रोफेशन से जुड़े लोग अपने करियर को लेकर बेहद चिंतित हैं। आईटी प्रोफेशनल्स को कोई और रास्ता नजर नहीं आ रहा है। बीते महीनों आई एक खबर के मुताबिक, इन्फोसिस कर्मचारियों को नौकरी से निकालने वाली थी। इससे पहले भी दूसरी कंपनियां जैसे विप्रो, टीसीएस और कॉगनिजेंट भी अपने यहां कर्मियों की छंटनी कर चुकी हैं। इसी बात से चिंतित होकर गुरुप्रसाद ने आत्महत्या कर ली।


आईटी सेक्टर में भारी छंटनी के सिलसिले में कंपनियों ने कार्यदक्षता के मुताबिक नवीकरण की बात की तो भारत सरकार की ओर से कह दिया गया कि आईटी सेक्टर में कोई खतरा है ही नहीं।क्योंकि कंपनियां किसी की छंटनी नहीं कर रही है,सिर्फ कुछ लोगों के ठेके का नवीकरण नहीं किया जा रहा है।

मानव संसाधन से जुड़ी फर्म हेड हंटर्स इंडिया ने हाल में कहा है कि कि नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप खुद को ढालने में आधी अधूरी तैयारी के कारण भारतीय आईटी क्षेत्र में अगले तीन साल तक हर साल 1.75-2 लाख इंजीनियरों की सलाना छंटनी होगी। हेड हंटर्स इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के लक्ष्मीकांत ने मैककिंसे एंड कंपनी द्वारा 17 फरवरी को भारतीय सॉफ्टवेयर सेवा कंपनियों के मंच नासकाम इंडिया लीडरशिप फोरम को सौंपी गई रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए कहा, "मीडिया में खबर आई है कि इस साल 56,000 आईटी पेशेवरों की छंटनी होगी, लेकिन नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप खुद को ढालने में आधी अधूरी तैयारी के चलते तीन साल तक हर साल वास्तव में 1.75-2 लाख आईटी पेशेवरों की छंटनी हो सकती है।"




श्रमकानूनों में सुधार की वजह से श्रम विभाग और लेबर कोर्ट की कोई भूमिका नहीं रह गयी है।ठेके पर नोकरियां तो मालिकान और प्रबंधकों की मर्जी है।वे अपने पैमाने खुद तय करते हैं और उसी हिसाब से कर्मचारियों की छंटनी कर सकते हैं ।कर्मचारियों की ओर से इसके संगठित विरोध की संभावना भी कम है।क्योंकि निजीकरण,विनिवेश और आटोमेशन के खिलाफ अभी तक मजदूर यूनियनों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया है।नये आर्तिक सुधारों की वजह से ऐसे प्रतिरोध लगभग असंभव है।


डिजिटल इंडिया में सरकारी क्षेत्र में नौकरियां हैं नहीं और सरकारी क्षेत्र का तेजी से विनिवेश हो रहा है।आधार परियोजना से वर्षों से बेहिसाब मुनाफा कमाने वाली कंपनी इंफोसिस भी अब रोबोटिक्स पर फोकस कर रही है।सभी क्षेत्रों में शत प्रतिशत आटोमेशन का लक्ष्य है क्योंकि कंपनियों को कर्मचारियों पर होने वाले खर्च में कटौती करके ही ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो सकता है।


दूसरी ओर मार्केटिंग और आईटी सेक्टर के अलावा पढ़े लिखे युवाओं के रोजगार किसी दूसरे क्षेत्र में होना मुश्किल है।बाजार में मंदी के संकट और कारपोरेट एकाधिकार वर्चस्व,खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी,ईटेलिंग इत्यादि वजह से मार्केंटिंग में भी नौकरियां मिलनी मुश्किल है।


नालेज इकोनामी में ज्ञान विज्ञान की पढ़ाई,उच्च शिक्षा और शोध का कोई महत्व न होने से सारा जोर तकनीकी ज्ञान पर है और मुक्तबाजार में आईटी इंजीनियरिंग ही युवाओं की पिछले कई दशकों से सर्वोच्च प्राथमिकता बन गयी है।विदेश यात्रा और बहुत भारी वेतनमान की वजह से आईटी सेक्टर में भारतीय युवाओं का भविष्य कैद हो गया है।


मुक्तबाजार से पहले कृषि इस हद तक चौपट नहीं हुई थी।नौकरी न मिले तो खेती या कारोबार का विकल्प था।लेकिन आईटी इंजीनियरों के सामने जीएसटी के जरिये हलवाई की दुकान या किराने की दुकान में आईटी सहायक के सिवाय कोई विकल्प बचा नहीं है।ऐसी नौकरी मिल भी जाये तो वह आईटी सेक्टर के भारी भरकम पगार के मुकाबले कुछ भी नहीं है।


हालत यह है कि मीडिया के मुताबिक आईटी कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाने की कोशिश में जुटा द फोरम फॉर आईटी एम्पलॉयीज (एफआईटीई) ने कहा है कि आईटी व अन्य बड़ी कंपनियों की तरफ से  छंटनी के खिलाफ विभिन्न राज्यों में श्रम विभाग के पास करीब 85 याचिका दाखिल की गई है। चेन्नई में संवाददाताओं से बातचीत में फोरम के महासचिव विनोद ए जे ने कहा, अगले छह हफ्तों में हमारे दिशानिर्देश के तहत अपनी-अपनी कंपनियों के खिलाफ करीब 100 कर्मचारी शिकायत दाखिल करेंगे।

फोरम का दावा है कि कॉग्निजेंट, विप्रो, वोडाफोन, सिनटेल और टेक महिंद्रा जैसे संगठनों के 47 कर्मचारियों ने श्रम विभाग पुणे में याचिका दाखिल की है, वहीं 13 याचिकाएं कॉग्निजेंट व टेक महिंद्रा के कर्मचारियों ने हैदराबाद में दाखिल की है। ये याचिकाएं औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2 ए के तहत दाखिल की गई है, जो वैयक्तिक याचिकाओं के लिए है। उन्होंने कहा, इस अधिनियम की धारा 2के सामूहिक याचिका के लिए है। कॉग्निजेंट व अन्य कंपनियों ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि वे कर्मचारियों की छंटनी नहीं कर रहे हैं। फोरम का दावा है कि करीब 3,000 कर्मचारियों ने उनसे संपर्क किया है। इसकी योजना समर्थन के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से संपर्क की भी है।


खबरों के मुताबिक पुणे में एक इंजीनियर ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके फील्ड में जॉब सिक्योरिटी नहीं थी। मृतक गोपीकृष्ण गुरुप्रसाद (25) आंध्र प्रदेश का निवासी था। कुछ दिनों पहले ही मृतक ने पुणे में नई कंपनी जॉइन की थी। पुणे के विमानगर इलाके स्थित एक होटल के ऊपर वाली मंजिल से गुरुप्रसाद ने छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने से पहले मृतक ने अपना हाथ काटने की  कोशिश की। गुरुप्रसाद इससे पहले दिल्ली और हैदराबाद में भी नौकरी कर चुका था। मौके से पुलिस ने एक सुसाइड नोट भी बरामद किया।


नोट में मृतक ने लिखा, 'आईटी में कोई जॉब सिक्योरिटी नहीं है। मुझे अपने परिवार को लेकर चिंता होती है।' शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।


खुदकशी की इस घटना को नजर्ंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि मैककिंसे एंड कंपनी की रिपोर्ट में कहा गया था कि आईटी सेवा कंपनियों में अगले 3-4 सालों में आधे कर्मचारी अप्रासंगिक हो जाएंगे। मैककिंसे एंड कंपनी के निदेशक नोशिर काका ने भी कहा था कि इस उद्योग के सम्मुख बड़ी चुनौती 50-60 फीसदी कर्मचारी को पुन: प्रशिक्षित करना होगा क्योंकि प्रौद्योगिकियों में बड़ा बदलाव आएगा। इस उद्योग में 39 लाख लोग कार्यरत हैं और उनमें से ज्यादातर को फिर से प्रशिक्षण देने की जरूरत होगी।


बड़ी संख्या में आईटी इंजीनियरों के बेरोजगार होने या उनकी नौकरियां असुरक्षित हो जाने की स्थिति खेतों की तरह आईटी सेक्टर के बी कब्रिस्तान में तब्दील हो जाने का खतरा है।

अमेरिका, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में वर्क वीजा पर कड़ाई की वजह से भारतीय सॉफ्टवेयर निर्यातक पर विशेष रूप से मार पड़ी है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस  में नई प्रौद्योगिकी, रोबोटिक प्रक्रिया ऑटोमेशन और क्लाउड कंप्यूटिंग की वजह से कंपनियों अब कोई कार्य कम श्रमबल से कर सकती हैं। इसकी वजह से सॉफ्टवेयर कंपनियों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ रहा है।


भारतीय आईटी सेक्टर के प्रोफेशनल्स के छंटनी की टेंशन बाद एक और समस्या का पहाड़ उन लोगों पर टूटने लगा है। आईटी प्रोफेशनल्स को पहले अपनी जॉब तो अब अपने जीवनसाथी ढ़ढने में दिक्क्तें आ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईटी प्रोफेशनल्स से लोग शादी करने से अब कतरा रहे हैं।


मैट्रीमोनियल वेबसाइट के ट्रेंड और पारंपरिक तौर पर 'रिश्ते मिलाने वालों' को देखा जाए तो मालूम होता है कि समय बदल चुका है| 'साफ्टवेयर इंजीनियर' दूल्हों की डिमांड अब पहले के मुकाबले बहुत कम हो गई है। सूत्रों के मुताबिक सामने आया है कि इसकी मुख्य वजह है आईटी सेक्टर में अनिश्चतता और छंटनी, ऑटोमेशन से नौकरियों पर मंडराता खतरा। इसके पीछे एक बड़ी वजह मानी जा रही है अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के तहत संरक्षणवादी भावना का बढ़ना। इस वजह कई भारतीय को अमेरिका से भारत लौटना पड़ा हैं।


सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स पर जो आदर्श वर का ठप्पा लगा था वह अब कम होने लग गया है, खासतौर पर जब अरेंज मैरिज की बात हो।

एक अंग्रेजी पेपर में छपी खबर के मुताबिक एक मेट्रीमोनियल एड का जिक्र है जिसमें तमिल के रहने वाले माता-पिता ने अपनी बेटी के लिए दूल्हे का ऐड छपवाया जिसके अंत में लिखा था हमें आईएएम, आईपीएस, डॉक्टर और बिजनेस मेन की तलाश है, कृपया सॉफ्टवेयर इंजीनियर कॉल न करें। शादी डॉट कॉम के सीईओ गौरव ने बताया कि, इस साल की शुरूआत से ही आईटी प्रोफेशनल्स तलाशने वाली लड़कियों की संख्या में कमी दर्ज की है।