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शनिवार, 17 दिसम्बर 2011

मुंबई छोड़ दी मैने

डेढ़ दशक पहले की बात है. वह कोई 95-96 का समय था. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जंघई जंक्शन से इलाहाबाद और इटारसी होते हुए एक किशोर मुंबई पहुंचा था. कैसे पहुंचा यह जाने बिना क्यों पहुंचा इसे समझना मुश्किल होगा. हम जिस इलाके में पैदा हुए वह स्वभाव से परजीवी इलाका है. इस परजीवी इलाके में कोई सौ साल पहले पिया लोग रंगून जाया करते थे. फिर कलकत्ता तक सिमट गये. इसके बाद हम जिस वक्त में बड़े हो रहे थे उस दौर में यहां के परजीवी मुंबई जाया करते थे. डेढ़ दशक बाद भी मुंबई जाने की इस रफ्तार में कोई कमी नहीं आई है लेकिन हम अपने जाने को अपनी उस नौजवान आंख से एक बार पीछे मुड़कर फिर देखना चाहते हैं जिसकी चर्चा जाने अनजाने राहुल गांधी ने कर दी है.

वह जो काशी एक्सप्रेस है वह न जाने कितने समय से बुढ़ाने, लात खाने और अपमान सहकर जीने की कला सिखाने के लिए दशकों से नौजवानों को मुंबई पहुंचाने का काम कर रही है. हमें भी उसी काशी में जगह मिली. घर से प्रस्थान करते हुए सिर्फ टिकट का पैसा मिला. इलाके के कर्मकाण्डीय और आडंबरयुक्त स्वभाव के कारण मां ने कुछ पैसे अलग से भी दिये थे. इसलिए नहीं कि उसका मैं अपनी जरूरतों के लिए कुछ इस्तेमाल कर सकूंगा, बल्कि इसलिए कि ऐसा करना शुभ माना जाता था. मां के दिये पैसे के साथ यह संदेश भी होता था कि इस पैसे को खर्च नहीं करना है बल्कि बचाकर रखना है क्योंकि यह पैथान (प्रस्थान) का पैसा है और इसे संभालकर रखने से इसमें और अधिक पैसा जुड़ता है. जाहिर है, मां चाहती थी कि बेटा दिये गये पैसे को हजारगुना करके वापस करे। इसीमें बेटे की भी सफलता है और मां की भी सार्थकता। हमारी रवानगी ऐसे हुई मानों हमें सीमा पर भेजा जा रहा है. घर से निकलते हुए हमें नहीं याद कि हमने अपने मां-बाप के चेहरे को गौर से देखा हो। लेकिन छिपते छिपाते उनके चेहरों पर जो नजर पड़ी तो आंखें ही दिखीं. उम्मीद की आंखे. उम्मीद की वे दो जोड़ा आंखें क्या आस लगाये हुए थीं, उस वक्त तो समझ में नहीं आया लेकिन अब समझ में आता है. इलाके की सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दरिद्रता की दर्दनाक त्रयी में ऐसी आंखे किसी एक घर या परिवार में ही मौजूद नहीं हैं. समूचा पूर्वी उत्तर प्रदेश ऐसी ही दर्दनाक उम्मीदों का आशियाना है.

फिर भी मुंबई जाने और कुछ कर दिखाने की किशोर समझ इतनी प्रबल थी कि ट्रेन के चालू कम्पार्टमेन्ट की गंदगी, भीड़ और एक फिट की सीट पर चौबीस घण्टे गुजारते हुए भी पहुंचने पर यह कहना कि बड़े आराम से आ गये सब कुछ नया और अनोखा लग रहा था. इलाहाबाद के बाद रात कैसे बीती पता नहीं लेकिन आंख जहां से खुली वहां से पहाड़ों के गुजरने का नजारा दिख रहा था. दूर तक खाली मैदान के बाद दूर नजर आते विंध्य पर्वतमाला के पहाड़ बरबस आकर्षित कर रहे थे. जिस किशोर के लिए अभी तक जंघई स्टेशन से भों भों करके गुजरती ट्रेन ही आकर्षण हुआ करती थीं, वह आज खुद उस ट्रेन में सवार होकर सरपट सबको पीछे छोड़ता जा रहा था. बिजली का इंजन हमारे एजे से कई गुना ज्यादा तेज दौड़ रहा था. जितनी तेज ट्रेन दौड़ रही थी उससे भी ज्यादा तेज मन भाग रहा था. वह मन मुंबई के और करीब पहुंचता जा रहा था जहां जाना उसकी एकमात्र नियति थी. मानो उसके पैदा होने का उद्येश्य निश्चित था. उसे कुछ कक्षाओं की पढ़ाई करनी है और जैसे ही हाथ पैर में थोड़ी जान आयेगी उसे मुंबई के लिए रवाना कर दिया जाएगा. मानवीय श्रम शोषण की ऐसी त्रासदी और कहां होती है, उस जगह को अभी तक तो नहीं देख पाया हूं लेकिन इस इलाके में पूरी निष्ठा और लगन के साथ खुद ही इस शोषण को अंजाम दिया जाता है.

हम जिन लोगों के साथ मुंबई गये थे वे हमारे गांव के सफल आदमी थे. वे गांव आते थे तो उनके चेहरे का पीलापन और शरीर के साफ कपड़े दोनों ही मुंबईवासी होने की निशानी होते थे. उनके बच्चों से हम दोस्ती करते थे क्योंकि वे मुंबई से आते थे तो उम्मीद लेकर आते थे. उनके हाथों में कुछ ऐसे सामान हमेशा होते थे जो इस कर्मजले गांव के बच्चों को क्योंकर नसीब होते? यह तो उन बच्चों को नसीब होते हैं जिनके बाप मुंबई रहा करते थे. पंद्रह रूपये वाली घड़ी, बीस रूपये वाला चश्मा, साफ कपड़े, जेब में पांच दस रूपये के नोट और पंसारी की दुकान से बड़ी सहजता से बिस्कुट का पैकेट खरीद लेने का सामर्थ्य हम सबके सामने मानों जीवन का अगला लक्ष्य निर्धारित कर रहा था. इसलिए उनके साथ मुंबई जाने का "सौभाग्य" कोई कम बड़ी बात नहीं थी. पठार, पहाड़ और गुफाओं को पार करते हुए हमारे नथुनों में जैसे ही फैक्ट्रियों का धुंआ घुसने लगा मैं समझ गया हम मुंबई के करीब आ गये हैं. करीब चौबीस घंटे के सफर के बाद एक बार धुंधलाती शाम को बाहर फैक्ट्रियों की ढेर सारी रोशनी ऐसी दीवाली दिखा रही थी जैसी इस जीवन में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. इसलिए अब पहली बार लगा कि हम बड़ी दुनिया में प्रवेश करने जा रहे हैं. अभी तक पूरी यात्रा को चुपचाप देखते रहने के बाद पहली बार लगा कि किसी ऐसी दुनिया के सामने हाजिर होने जा रहे हैं जो मेरी संभावनाओं का सही पता लगा सकती है. देर रात ट्रेन से उतरकर हम जहां पहुंचे उसे वहां की भाषा में आज भी झुग्गी ही कहा जाता है. गांव के चाचा, चाची, उनके तीन चार बच्चे और मैं. कमरा सिर्फ एक. फिर भी, वहां पहुंचते ही मुझे बड़ा झटका लगा हो ऐसा नहीं है. असल में तो मुझे होश ही नहीं था. चौबीस घंटे की खट पट खट पट सुनने के बाद नींद बड़ी तेज आ रही थी और जहां पड़े वहीं सो गये. सोते में भी कानों में ट्रेन की सुरीली खटपट ही चलती रही. सुबह उठे तो बड़े भाई मौजूद थे अपने साथ ले जाने के लिए. मुंबई की उस झुग्गी बस्ती से भाई के अपेक्षाकृत साफ सुथरे कमरे तक का सफर भी कम रोमाचंक नहीं था. उसने रास्ते में मुझे वह सबकुछ दिखाया जिससे मैं उसके ऊपर यह विश्वास कर लेता कि उसका मुंबई के बारे में सामान्य ज्ञान बहुत अच्छा है.

लेकिन मुंबई पहुंचकर इस किशोर के सामने अब चुनौती यह थी कि करना क्या है और रहना कहां है. ग्रामीण रिश्ते इतने मजबूत थे कि मैं भाई के साथ भरपूर अन्याय करते हुए उसके कमरे में रह भी सकता था और उससे पैसे लेकर घूमने भी जा सकता था लेकिन यह सब बहुत दिन तो नहीं चलनेवाला था. इसलिए इस किशोर को काम की तलाश में लग जाना था. इस अठारह उन्नीस साल के नौजवान को दो तीन महीने के लिए कोई काम चाहिए था ताकि वह इतना पैसा कमा सके कि वापस लौटकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अपनी पढ़ाई पूरी कर सके. क्योंकि मां ने कितनी भी उम्मीद से बीस रूपये का पैथान दिया हो लेकिन नौजवान तो इलाहाबाद युनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए कुछ पैसा कमा लेना चाहता था. हालांकि मुझे बाद में अहसास हुआ कि मुझे खदेड़ा ही इसलिए गया था कि पढ़ाई से ज्यादा अब मैं कमाई पर ध्यान दूं लेकिन अपने मन में तीन महीने कमाने का ही लक्ष्य था. ये तीन महीने फिर तेरह महीने और फिर तीन साल के तीन अनुभव ऐसे रहे कि मुंबई एक स्वप्निल शहर की बजाय हमारे जैसे नौजवानों के लिए एक त्रासदी नजर आई. समूची मुंबई एक ऐसी मिल नजर आई जिसमें जवानी का कच्चा माल झोंककर उसकी ताकत से इस शहर के लिए समृद्धि निचोड़ ली जाती है और फिर उस शरीर के बुढ़ापे को गांव की ओर वापस फेंक दिया जाता है. यह सब होने में तीन चार दशक लगता जरूर है लेकिन यह एक प्रक्रिया सी बन गई है जिसकी शुरूआत पैथान देकर होती है. इस प्रक्रिया से गुजरा बुजुर्ग आनेवाली पीढ़ी को वही लक्ष्य सौंप देता है जिसे निचुड़कर वह नष्ट हो आया है. इसलिए इस प्रक्रिया का अनिवार्य और अघोषित रूप से पालन किया जाता है.

अपनी किशोराबस्था हम जंघई मेरी जान जानते हुई बिता रहे थे लेकिन बंबई पहुंचे तो अब हमें एक नई भाषा सीखने की जरूरत महसूस हो रही थी- बंबई मेरी जान. जंघई से बंबई (अब मुंबई) का यह बदलाव न तो इतना आसान था कि इसे झटपट स्वीकर लिया जाए और न ही इतना सम्मानजक कि इसको अपना परिचय बनाया जा सके. मुंबई में आम तौर पर हमें भैय्या कहा जाता है. हमें याद है बचपन में अपने बड़े भाई को नाम की बजाय भैय्या कहने के लिए हमें किस प्रकार "संस्कारित" किया गया था. इस संस्कार को ग्रहण करने में कई बार मां-बाप की डांट भी शामिल थी और कुछ थप्पड़ भी. लेकिन इस शहर में आकर महसूस हुआ कि सम्मान के शब्दों को भी गाली में तब्दील कि जा सकता है. अगर बोध नकारात्मक हो तो शब्द कितने भी सुंदर हो अपना भाव खो देते हैं. हम पूर्वी उत्तर प्रदेश से मुंबई आते हैं तो हमारी सिर्फ एक योग्यता है कि हम भैय्या है. कई बार भैय्या साला भी. यह उन मराठी लोगों के मानसिकता पर निर्भर करता है कि वे हमें भैय्या कहकर सम्मानिक करेंगे या भैय्या साला कहकर अपमानित करेंगे. उनके मन में भाव कोई भी हो उनकी जुबान से ये शब्द कभी अच्छे नहीं लगे.

इसलिए सबकुछ करते हुए भी मन अंदर से यह मानने को तैयार नहीं था कि यहां रहना चाहिए. देश के दूसरे हिस्सों में पलायन करके रह रहे लोग भी क्या वैसे ही रहते हैं जैसे मुंबई में ये उत्तर भारतीय रहते हैं? यह सवाल बार बार मेरे मन में उठता था. करीब डेढ़ सौ साल की जड़ जमाने के बाद मुंबई में उत्तर भारतीयों की आर्थिक स्थिति भले ही अब अच्छी हो चली हो लेकिन सामाजिक रूप से वे अभी भी एक बहिष्कृत और अपमानित जमात हैं. वे भले ही अपने आयोजनों और उत्सवों से समाज होने की कोशिश करते हों लेकिन डेढ़ सौ साल बाद भी वे एक समाज नहीं हो पाये हैं. मुंबई के मराठी समाज ने न तो उन्हें कल स्वीकार किया था और न ही आज स्वीकार कर रहा है. फिर मराठी माणुस की मानसिकता और स्थानीय अधिकारों की वकालत करनेवाले राजनीतिक दल आग में घी डालने का काम करते हैं. इन राजनीतिक दलों के मुखिया ये नहीं जानते कि इनके बयान हम जैसे नौजवानों को अंदर से कितना अपमानित करते हैं, और मुंबई किस तरह हमें डराने लगती है. फिर भी मुंबई में जिससे भी बात करते उसका एक ही जवाब होता- यह मुंबई है और यहां तो ऐसा ही होता है. यह जवाब कुछ कुछ वैसा ही है जैसे दिल्ली में बिहार से आया हुआ कोई नौजवान इसे डिल्ली है डिल्ली कहकर अपने यहां होने का सामर्थ्य प्रकट करता है. लेकिन आश्चर्य देखिए कि इस अपमान में भी सम्मान खोज लेने की कला कोई परजीवी और बेशर्म समाज ही कर सकता है. और यह काम मुंबई के उत्तर भारतीय जमात ने बखूबी कर रखा है.

अपनी इसी शुरूआती यात्रा में एक बार मैंने एक मराठी नौजवान धनंजय से एक सवाल पूछा था जो आम मराठियों जैसा मूर्ख बिल्कुल नहीं था. मैंने उससे पूछा कि आखिर यहां के लोग यूपी बिहार के लोगों से इतनी नफरत क्यों करते हैं? उसने कहा था कि तुम लोग यहां आना बंद कर दो, इनकी नफरत खत्म हो जाएगी. मैंने उससे जानना चाहा था कि हमारे पास पैसा नहीं है. हम अपने ही देश के एक हिस्से में अगर दो पैसा कमाने के लिए आते हैं तो क्या गलत करते हैं? धनंजय ने कहा था कि तुम लोग यहां आकर जितना संघर्ष करते हो अगर इतना संघर्ष अपने इलाके में करो, तो तुम्हें यहां आने की जरूरत ही नहीं रहेगी. तुम्हारे पास देश की सबसे उपजाऊ मिट्टी है. तुम्हारे पास देश का सबसे अच्छा दिमाग है, तुम्हारे पास गंगा और यमुना है, फिर तुम लोग मेहनत मजदूरी करने यहां क्यों चले आते हो? उसके इस सवाल का हमारे पास भला इसका क्या उत्तर हो सकता था?

डेढ़ दशक पहले भी हमारे पास धनंजय के सवाल का कोई जवाब नहीं था और आज डेढ़ दशक बाद जब एक नयी पौध अपमान की रोटी कमाने के लिए मुंबई की ओर कूच कर चुकी है हमारे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है. राहुल गांधी ने इसी पूर्वी उत्तर प्रदेश में अगर मुंबई में उत्तर भारतीयों के भीख मांगने का सवाल उठाया है तो इसमें ऐसा कुछ गलत नहीं है जिसे स्वीकार न कर लिया जाए. अपमान से कमाया गया धन भीख ही होता है. और मुंबई किसी भी उत्तर भारतीय को सम्मान से धन कमाने का मौका मुहैय्या नहीं कराती है. फिर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश का लगभग हर दूसरा नौजवान मुंबई की गलियों में गालियां खाने के लिए मजबूर है. आखिर क्यों नहीं प्रदेश की कोई सरकार ऐसे इंतजाम करती कि कम से कम इस इलाके के लोगों को अपमान की रोटी के लिए मुंबई जाना बंद हो? मैंने तो धनंजय की बात मान ली अपनी शर्तों पर तीन साल के अंदर मुंबई को अलविदा बोल दिया. वहां की सफलता की मृग मरीचिकाएं मुंझे तीन साल से ज्यादा रोक न सकीं. दिल्ली पहुंच गये. लेकिन आज भी लाखों नौजवान अपमान की रोटी कमाने के लिए मजबूर हैं. उत्तर प्रदेश में आगे जो भी सरकार आये कम से कम उसके एजंडे में एक बात जरूर होनी चाहिए कि वे ऐसी योजना बनाएं ताकि पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह पलायन पूरी तरह न भी रुके तो कम से कम आंशिक रूप से कम जरूर हो जाए. इसी से उत्तर प्रदेश के नौजवानों के लिए सम्मान का रास्ता भी निकलेगा और मुंबईवालों की उत्तर भारतीयों के प्रति नफरत भी कम होगी.

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