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बृहस्पतिवार, 26 जनवरी 2012

बिहार में मेधा पाटकर, मुख्यमंत्री से मुलाक़ात की भी संभावना

२७ जनवरी को ४ बजे ए एन सिन्हा इंस्टिट्यूट, पटना मे ‘विकास, लोकतंत्र, जनांदोलन’ पर मेधा पाटकर का वक्तव्य. इससे पहले ११ बजे कारगिल चौक, पटना मे आम सभा का आयोजन.
उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के दो चरणों के बाद लोकशक्ति अभियान का कार्यक्रम बिहार में जारी है. इसकी शुरुवात २३ जनवरी को टाउन हाल, अररिया में मनरेगा के मजदूरों का संघ के मुद्दे पर आम सभा से हुआ. आदिवासिओं के ज़मीनों का हस्तांतरण के ऊपर आम सभा इस्तान पब्लिक हॉल, इसलामपुर में, भजनपुर, फारबिसगंज में फारबिसगंज में हुए गोलीकांड के ऊपर आम सभा २४ जनवरी को हुआ.

२५ जनवरी को बीरपुर, सुपौल में कोसी बाढ़ के ऊपर आम सभा, काटी थर्मल पॉवर पलांट, मुज्ज़फ्फरपुर के मुद्दे पर आम सभा, मढ़वन, चैनपुर बिसुनपुर में एस्बेस्टोस फैक्ट्री के मुद्दे पर आम सभा और सीनेट हॉल, मुजफ्फरपुर में सभा हुआ.

गोपाल गंज में आम सभा, पंजवार कॉलेज, रघुनाथपुर के पास, सीवान में शहीद चंद्रशेखर के प्रतिमा का माल्यार्पण, बाबु ब्रज किशोर प्रसाद के मूर्ति का अनावरण एवं लोकतंत्र दिवस के अवसर पर झंडोतोलन २६ जनवरी को और पटना मे रात्री मे आगमन.

बिहार अभियान में मेधा पाटकर, राजेंद्र रवि, मधुरेश, सुनीता, आशु, अमर मिश्रा, राकेश रफ़ीक, जे पी सिंह और नागेश त्रिपाठी, रोशन लाल अग्रवाल, प्रसाद बागवे और अन्य जगह के सामजिक कार्यकर्ता साथी भी साथ है. मेधा और उनके साथियों ने बंगाल के रास्ते बिहार मे प्रवेश किया. नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज पूरी यात्रा और बिहार के गैर जिम्मेदार मीडिया तबके के रवैये के साक्षी रहे. संविधान में निहित अधिकारों, कर्तव्यों और जनता का प्राकृतिक संसाधनों के ऊपर संरक्षण के लिए किया गया हर यात्रा अगर सत्तालोलुप नहीं हो तो वैसे ही स्वतः स्फूर्त जन सैलाब सजीव हो उठता है जैसा इस निस्वार्थ भाव से किये गए यात्रा के दौरान हुआ. इन सब के बीच राजधानी मे मुख्यमंत्री से मुलाक़ात की संभावना के कयास लगते रहे.

इस दौर मे जब संसद मे नुमाइन्दगी करते अधिकतर लोग जनता के प्रति वफादार नहीं रहे, इन यात्राओ का महत्व दूरगामी है. ये ऐसे नहीं जैसे जैसे मंच पर नकली व स्वार्थी और कंपनियों की दलाली य वकालत करते नेता और उनसे डरी सहमी-सी वोट बैंक बनी जनता कोशो दूर बैठ उन्हें बर्दाश्त भर कर लेती है. यह अच्छा ही है कि इस दौर मे सब कुछ रिकॉर्ड हो रहा है. नेताओ और फर्जी और बिकाऊ पत्रकारों का कुछ ही दिनों मे असलियत का खुलासा हो जायेगा. कम्पनियों के पालतू की तरह परवरिश को खुद्दारी की रोजी रोटी तो नहीं ही कहा जा सकता. ऐसे मे जब हर तरफ पतन हो रहा है भाषा के स्तर पर इसका असर दिख रहा है तो ज्यादा कठोर शब्द इस्तेमाल करने से भी क्या हासिल होगा. या तो मोटी होती त्वचा पर इसका असर ही न होगा या त्वचा मे इतनी चिकनाइ आ गयी होगी की अर्थ ही फिसल जाए. यात्रा प्रासंगिक है और मात्र बौधिक विलास न होकर एक कदम ताल है जो जड़ता को तोड़ता है और बर्फीली होती जा रही संवेदनशीलता पर चोट करने की दिशा मे दूरदर्शी प्रतीत होता है, अगर नहीं है तो उसे होना चाहिए.

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